Wednesday, August 19, 2009

एक झलक ज़िन्दगी की....दो शब्द आभार के-

प्रस्तुत कविता-संग्रह मेरी वर्षो की कमाई है। माँ शारदे की कृपा मुझे अकिंचन पर कब हुई? मुझे कुछ पता नही और मैं कमाने निकल पड़ा। आज तक कमाता ही रहा और जो कुछ पूंजी संचित कर सका, आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।
नाम देने की बात आई, समझ नही पा रहा था की इसे क्या नाम दूँ? काफ़ी ऊहापोह की स्थितियों से गुजरते हुए इसका नामकरण हो सका। दुश्वारियां झेलनी इसलिए पड़ी की चिंतन की कोई एक ख़ास दिशा नही थी। मन-मस्तिष्क कई विधाओं में कार्य कर रहा था। संकलन पर विहंगम दृष्टि डालने पर  परिणाम स्पष्ट हो जाता है। ज़िन्दगी के तमाम मसाइल पर मंथन करते-करते विचार-भाव एक-एक आकार धारद करते गए। परिणामतः, संग्रह कविताओं के विभिन्न रंगों की एक अल्पना हो गया।
मैं उन तमाम व्यक्तियों एवं परिस्थितियों, जिनसे मुझे पदे-पदे प्रेरणा मिली तथा मैं कुछ लिखने में समर्थ हो सका, का तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।
अपरंच, डॉ संतोष जी साधुवाद के पात्र हैं जिन्होंने बड़ी ही गंभीरता से संकलन का अवलोकन किया तथा अपने विचारों से आपको अवगत कराया। अपने से सभी बड़े-बुजुर्गों के आर्शीवाद की कामना करते हुए सुधि पाठक जन के मन को यदि मेरे विचार छु सके तो मैं अपने प्रयास को सफल मानूंगा।
मेरे पास वे शब्द नही हैं जिनसे मैं मेरे अपने भाई श्री सर्वेन्द्र विक्रम सिंह के प्रति आभार व्यक्त कर सकूँ। मेरे विचार एक आकार पा सकें, यह इन्ही की प्रेरणा एवं परिश्रम का प्रतिफल है।
थोड़ा कुछ और-
मुझे तेरी फितरत से नफरत नही, ऐ दुनिया वालों!
आख़िर, मैं भी तो एक हरफ हूँ तेरी ही रौशनाई का॥
-डॉ हरिनाथ मिश्र

2 comments:

  1. Very Difficult and classical hindi........

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  2. aapne sahi kaha ki man mastishk kai vidhaaon main karya kar raha tha...
    ...aur isi karan itni vidhaaon main intni krityaan padhne ko milin....
    ...saheje jaane yogya kavya sankalan !!

    harek main 'individual' comment karna sambhav nahi atha: kum ko zayada maanein...

    Pranam.

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