Thursday, January 24, 2019

यह मुल्क़....


यह मुल्क़ हिंदुस्तान है ये मुल्क़ हमारा,
हमने इसे पल-पल है पसीने से सवांरा।
गांधी-जवाहर-बोस की आंखों का है तारा,
हमने इसे पल-पल है पसीने से सवांरा।।
          इस मुल्क़ में कोयल सुनाये गीत सुहानी,
          बहती हवा सदा बताये इसकी कहानी।
          सारे जहां का यही रहा सदियों सहारा,
          हमने इसे पल-पल है पसीने से सवांरा। if।
                         यह मुल्क़....
इसकी बसन्ती बास में है प्यार की खुशबू,
ऋतुयें तमाम करतीं फिरें सबसे गुफ़्तगू।
गुलशन में खिले फूल लगें जैसे सितारा-
हमने इसे पल-पल है पसीने से सवांरा।।
                         यह मुल्क़....
इस मुल्क़ में बहती सदा गोदावरी-गंगा,।
मेहनतकशों के रंग में यह देश है रँगा।
खेतों में हिंदुस्तान के जीवन की है धारा,
हमने इसे पल-पल है पसीने से सवांरा।।
                         यह मुल्क़....
आपस में नहीं जंग यहां नहीं दुश्मनी,
हिन्दू-मुसलमां-सिख-इसाई में है बनी।
चारो-तरफ़ इंसानियत का मस्त नज़ारा,
हमने इसे पल-पल है पसीने से सवांरा।।
                          यह मुल्क़....
इसके लिये हम खून-पसीना बहायेंगे ,
मर जायेंगे,मिट जायेंगे, ना सिर झुकायेंगे।
एक बार छक गये हैं ना छकेंगे दोबारा,
हमने इसे पल-पल है पसीने से सवांरा।।
                          यह मुल्क़....।।

Tuesday, January 22, 2019

हार से जीत से...


हार से जीत से कुछ न लेना हमें,
बस लगन चाहिए ज़िन्दगी के लिए।
देख,काशी में काबा में रखा है क्या-
बस किशन चाहिए वन्दगी के लिए।।
           है ये दुनिया का कितना बड़ा दायरा!
           इक से इक बढ़ के दौलत नशीं हैं यहां।
           पर हमारा न दौलत से नाता कोई -
           बस किरन चाहिए रौशनी के लिए।।
कुछ को शोहरत की रहती यहां लालसा,
कुछ को रहता नशा यार-दिलदार का।
हमको चहिये न दुनिया की कोई खुशी-
बस सनम चाहिए हर खुशी के लिए।।
          लोग दुनिया के अपनों में मशगूल हैं,
          चैन-अम्नो-ख़ुशी से ये महरूम हैं।
          मर मिटे दूसरों पर ये सीखा नहीं-
          बस,करन, चाहिए बानगी के लिए।।
लाख कोशिश किया हमने सुलझाने की,
ज़िन्दगी उलझनों में उलझती गयी।
उलझनों से न कोई बचा है यहां-
बस,मनन,चाहिए रुख़्सती के लिए।।
         चैन चित में नहीं,चैन दिल में नहीं,
         लगते बाहर से केवल वो जानो सुखी।
          वाह्य आडम्बरों से जो नफ़रत करे-
          बस वो मन चाहिए सादगी के लिए।।
सबके महले-दोमहले बहुत हैं यहां,,
पर जो देखा तो कोई नहीं है सुखी।
लोग रहते हर इक पल परेशान यहां-
बस,लगन, चाहिए ज़िन्दगी के लिए।।

बाँसुरी बेसुरी...


बाँसुरी बेसुरी हो गयी है।
पंखुरी खुरदुरी हो गयी है।।
         ऐसी घड़ियाँ न थीं कभी पहले,
         ऐसी बातें न थीं कभी  पहले।
          बात कैंची-छुरी हो गयी है।।
                           बाँसुरी बेसुरी...
प्रेम के बोल थे तब सुहावन,
नाते-रिश्ते भी थे बहु  लुभावन
दोस्ती अब बुरी हो गयी है।।
                बाँसुरी बेसुरी....
आबो-हवा से सँवरती थी सेहत,
करती नफ़रत कभी ना थी कुदरत।
अब वही आसुरी हो गयी है।।
                  बाँसुरी बेसुरी....
आस्था की शिला की वो मूरत,
जिसकी मजबूत थी हर परत।
रेत सी भुरभुरी हो गयी है।।
                  बाँसुरी बेसुरी....
ठोस थी नीवं इल्मो-हुनर की,
अपनी तहज़ीब की ,हर चलन की।
आज वो बेधुरी हो गई है।।
                  बाँसुरी बेसुरी....
अपनी धरती जो थी स्वर्ग जैसी,
पाप बोझिल जहन्नुम-नरक की-
अब मुक़म्मल पुरी हो गयी है।।
                बाँसुरी बेसुरी....
हो जाती थी नम आँख जो तब,
ग़ैर की हर ख़ुशी-ग़म में वो अब-
किस क़दर कुरकुरी हो गयी है।।
                    बाँसुरी बेसुरी....

गांधी तुझे...


गांधी तुझे सलाम तेरे नौनिहालों का,                     
कमाल का तू जबाब सारे सवालों का।।
        दुनिया को जो ठगे थे,
        अपनी गन्दी चालों से।
        ऐसे गुमानी गोरे  जो,
         अपनी  कुचालों  से।
विधिवत दिया सबक उन्हें अपने ख़यालों का।।
                               गांधी तुझे....
         क्रांति का जबाब तूने,
         शांति  से  दिया।
         पनाह शोषितों को बिना,
         भ्रांति  के  दिया।
तोड़ा ग़ुरूर तूने सारे  भुवालों  का ।।
                              गांधी तुझे....
         लगता बहुत अजीब कि,
          तू  है कोई  मानव।
          कृषकाय तू भले रहे,
          देखा नहीं  पराभव ।।
बन गए इतिहास कञ्चन अपनी मिसालों का।।
                             गांधी तुझे....
          इंद्र के घमण्ड का,
          तू  कृष्ण रूप हो।
           पाप के विनाश का,
           तू विष्णु रूप  हो।
तू ही अमोघ औषधि जग के बवालों  का ।।
                           गांधी तुझे....
          बढ़ता है पाप जब-जब,
         धरती पे  चारो- ओर।
         कराहती है  सभ्यता,
         ममता  चुराये  चोर।
होता जनम यहाँ पे तुम्हारे जैसे वालों का।।
                          गांधी तुझे....
          शत-शत नमन  तुम्हें,
          विराट-दिव्य  रूप!
          अस्थि-मांस-पिंजर,
           हे देव के स्वरूप!
श्रद्धा-सुमन स्वीकारो तू आज  अपने लालों का।।
                        गांधी तुझे सलाम....।।

व्यक्ति नहीं पूजा जाता...



व्यक्ति नहीं पूजा जाता,
पूजा जाता है व्यक्तित्व-
व्यक्ति तो हाड़-मांस का एक पुतला होता है,
जिसकी नियति है गल जाना-सड़ जाना-पूर्ण रूपेण
समाप्त हो जाना।
अमरत्व,दैवत्व की श्रेणी में आता है व्यक्तित्व-
कल था-आज है-
और कल भी रहेगा।
व्यक्ति की उपादेयता उसके व्यक्तित्व से होती है।
सुन्दर-स्वस्थ-हट्टा-कट्टा वह भले ही हो-
पर,मर्यादा विहीन गठीला बदन किसी भी-
काम का नहीं।
राम-कृष्ण-बुद्ध-ईसामसीह-मोहम्मद मात्र-
नाम और व्यक्ति ही नहीं-मूल्यों-आदर्शों एवम
मर्यादाओं के प्रतीक उदात्त व्यक्तित्व हैं।
बाधाएं-रोड़े-अनअपेक्षित घटनायें राह की
बाधक नहीं हो सकतीं-
चेत लक्ष्य अथवा ध्येय पक्का  हो।
कठिनाइयां तो आएंगीं-अपना काम करेंगीं।
हमें भी अपना काम करना है।
  कठिनाइयों से लड़ना है।
स्थापित करना है मूल्यों को,मर्यादाओं को।
 टूटना नहीं-बिखरना नहीं-मुड़ना नहीं-
बस,चलते ही रहना है-चलते ही रहना है -
        चलते ही रहना है।।

रिम-झिम....



रिम-झिम पड़ेला फुहार सवनवां त आय गईलें सखिया,
पेड़वा पे झुलेला झलुवा त दिलवा रसाय गईलें सखिया।।
                        पुरुवा के झोकवा से आवेले बयरिया,
                        पनिया के बूँदवा में टिके ना नजरिया।
                        त मनवाँ में उठै ले कसकिया-
                        सावरिया भुलाय गईलें सखिया।।
                                         रिम-झिम....
काले-काले बदरन कै छटा हौ निराली,
बिजुरी ज चमके त भागूँ हाली-हाली।
बिरहा के अगिया से जली मोरि-
सरीरिया कुम्हिलाय गईलें सखिया।।
                                        रिम-झिम....
एको पल सोवूं नाही, जागूँ सारी रतिया,
का करूँ रामा हमरे आवे नाही बतिया।
त हथवा कै गिनीला अँगुरिया-
रतिया अपार भईली सखिया।।
                                        रिम-झिम....।।

Thursday, January 10, 2019

बच्चा यहां...


हर बच्चा यहां महान है,
हर लड़की यहां की सीता-
हर लड़का यहां का राम है।।
                  बच्चा यहां....
हर बच्चा वचन है गीता का,
हर बच्चा धरम है ईसा का
इसमें मज़हब का भेद नहीं,
गोरे-काले का वेष नहीं।
हर बच्चा यहां रामायन-
हर बच्चा यहां कोरान है।।
                 बच्चा यहां....
इसको दुनिया से क्या लेना,
बस प्यार भरी मुस्की देना।
इसका सबसे रिश्ता है,
धरती का यही फरिश्ता है।
यह दौलत है हर मां की-
हर वालिद की शान है।।
          बच्चा यहां....
बच्चा जग का नूर है,
हर रंजोगम से दूर है।
लगता प्यार का भूखा ये,
नहीं किसी से रूठा ये।
यह चन्दा है हम सबका-
सूरज औ भगवान है।।
        बच्चा यहां महान है।।

Saturday, January 5, 2019

पंछी दरख़्त छोड़ के...


पंछी दरख़्त छोड़ के खम्भों पे आ गए,
बदले मिजाज़-ए-मौसम में उन्हें तार भा गए।
कूड़े के इस पहाड़ पे वे उड़-उड़ के यूँ फिरें-
मानो कि ज़िन्दगी का वे सामान पा गए।।
             पंछी दरख़्त छोड़ के....।
जंगल इमारतों के फैले हैं इस क़दर,
कि बेज़ार हो परिन्दे उड़ते  तितर- बितर।
बिन ठौर औ ठिकाने के करते भला वो क्या-
आफ़त-विपति के बादल उनपे यूँ छा गए।।
              पंछी दरख़्त छोड़ के....।
लीलतीं हैं सड़कें अब खेतों औ जंगलों को,
लूटती है दुनिया पशु-पंछि-स्थलों को।
आने लगे हैं गांवों में अब बाघ औ हिरन-।
लेने को अपना हक़ जो इंसान खा गए।।
               पंछी दरख़्त छोड़ के....।
ख़ुमार क्रूरता का लोगों पे चढ़ रहा,
अत्याचार जानवरों पे बेशुमार बढ़ रहा।
पर्यावरण की शुद्धता पशु-पंछियों से है-
प्राकृतिक प्रकोप में तो कुनबे समा गए।।
                 पंछी दरख़्त छोड़ के....।
नदियाँ-दरख़्त-पर्वत-झीलें हैं ज़िन्दगी,
पूजा करो प्रकृति की पावोगे हर खुशी
करना नहीं क़ुदरत से कभी बेवजह की छेड़-छाड़-
क़ुदरत का ही तो क्रोध सुनामी को ढा गए।।
                  पंछी दरख़्त छोड़ के....।
जंगल अमूल्य निधि है, औषधि अमोघ है,
नदियों का जल है अमरित, पावन सुभोग है।
चाहिए इन्हें समझना बस देव का प्रसाद -
धरती पे इस प्रसाद को ईश्वर बसा गए।।
                   पंछी दरख़्त छोड़ के....।

झूमते हैं भौंरे...


झूमते हैं भौंरे कलियों  को देख कर।
फूलों के तन से टपके पसीना यूँ तरबतर।।
        झरनों की थिरकनों से दिल होता बाग-बाग।
        लगती उन्हें है ठोकर,गिरते हैं दर-ब-दर।।
कोयल की मीठी बोली लगती बड़ी सुहानी।
काली निशा से निकले,रवि-रश्मि बनके रहबर।।
       विश्वास-आस्था से बढ़ कर नहीं है कुछ भी।
       होती नहीं तसल्ली,दिल में किसी को ठग कर।।
छोटा ही सा बीजांकुर बनता विशाल तरुवर।
संघर्ष से ही जीवन,होता है प्यारे बेहतर।।
       लेती है इम्तिहान हरदम पग-पग पे ज़िन्दगी।
       डट कर करो मुक़ाबला,कस-कस के ख़ुद कमर।।
ख़ुद के लिए जो जीता जीना नहीं है उसका।
पत्थर भी खा के देता,मीठा ही फल ये तरुवर।।

Saturday, December 22, 2018

हे महाशक्ति,है महाप्राण!...


हे महाशक्ति!हे महाप्राण!मेरा वन्दन स्वीकार करो।
कर दो सम्भव मैं तिलक करूँ,मेरा चन्दन स्वीकार करो।।
                                   हे महाशक्ति,है महाप्राण!....
युगों-युगों से इच्छा थी,कब तेरा दीदार करूँ?
चाहत थी ना जाने कब से तेरा ख़िदमदगार बनूँ?
करूँ अर्चना तत्क्षण तेरी,मेरा क्रन्दन स्वीकार करो।।
                                हे महाशक्ति,हे महाप्राण!....
ललित ललाम निनाद तुम्हारा महाघोष परिचायक है।
जलनिधि का नीलाभ आवरण चित-हर्षक-सुखदायकहै।
करो कृपा मैं आसन दे दूँ, मेरा स्यंदन स्वीकार करो।।
                            हे महाशक्ति,हे महाप्राण!....
पूनम का वो चाँद सलोना जब अम्बर पे होता है,व
तू ले अँगड़ाई ऊपर उठ कर बाहों में भर लेता है।
बंधू प्रेम-धागे से तुझ सङ्ग, मेरा बन्धन स्वीकार करो।।
                           हे महाशक्ति,हे महाप्राण!....
तू पयोधि-उदधि-रत्नाकर,जल-थल-नभ-चर पालक है।
प्रकृति-कोष के निर्माता तू,जीवन-ज्योति-विधायक है।
चरण पखारू मैं भी तेरा,मेरा सिंचन स्वीकार करो।।
                          हे महाशक्ति,हे महाप्राण!....।।

किसी शक्ति ने जन्म लिया...


जब -जब पाप बढ़ा धरती पे,
किसी शक्ति ने जन्म लिया।
पाप से बोझिल इस धरती को,
पाप-फ़ांस से मुक्त  किया।।
        जीवन कभी न बच पाया है,
       झूठ के अलम्बरदारों से।
       कामी, कपटी,कुटिल,प्रलोभी,
       जुर्म के ठेकेदारों  से।
       साफ-पाक-बेबाक मोहब्ब्त, 
       जब -जब जग में रोई है।
       उसकी ही मुस्कान की ख़ातिर -
       किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
नकबजनी होती रहती है,
मन्दिर-मस्ज़िद-गुरुद्वारे में।
क्या-क्या नहीं हुईं हैं बातें,
गिरजाघर के बारे में।
इंसान बना इंसाफ़ का दुश्मन,
जब-जब इस धरती पे।
लूट-पाट-उत्पात रोकने-
किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
     लहू-लुहान जब हुई मनुजता,
     रक्त-पात चहुँ ओर हुआ।
     चन्दन जब त्यागा शीतलता,
     अमृत विष घनघोर हुआ।
     नहीं बचे जब पोथी-पन्ना,
     शिक्षा-सदन कंगाल हुआ।
     तालीम -इल्म-रक्षार्थ जगत में-
     किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
राह सही इंसान चुनें सब।मेल-भाव से पलें-बढ़ें ।
हक़-हुक़ूक़ को ध्यान में रख के,
आपस में नहिं लड़ें-भिड़ें ।
कोई दुशासन जब-जब करता
अबला का यदि चीर-हरण।
नारी-लाज बचाने ख़ातिर-
किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
     पर्वत-शिखर, समन्दर-तट तक,
     चहुँ-दिशि विलसे, दिगदिगन्त तक।
     एक जाति हो,एक धर्म हो,
     एक भाव मानुष -मन तक।
      जब इसके विपरीत हुआ कुछ,
      नामाकूल सलूक़ हुआ कुछ।
     सुख-सुकून को क़ायम रखने-
     किसी शक्ति ने जन्म लिया।।

Saturday, December 8, 2018

क्या रह पाओगे?


रिम-झिम हो बरसात,
पिया नहीं साथ-कहो क्या रह पाओगे?
सावन की हो रात,
पिया नहीं साथ-कहो,क्या रह पाओगे?
    मेघ-गरजना से दिल दहले,
     बिजली आंख मिचौली खेले।
      लिए विरह-आघात-कहो, क्या रह पाओगे?
धरती ओढ़े धानी चुनरिया,
बलखाती-इठलाती गुजरिया।
वन-उपवन भरे पात-कहो, क्या रह पाओगे?
      सन-सन बहे पवन पुरुवाई,
       कारी बदरिया ले अंगड़ाई।
       सिहर उठे तन-गात-कहो, क्या रह पाओगे?
बस्ती-कुनबा, गांव-गलिन में,
बाग़-बग़ीचा, खेत-नदिन में।
क़ुदरत की सौग़ात-कहो, क्या रह पाओगे?
     अनुपम प्रकृति-प्रेम-रस बरसे,
      निरखि-निरखि जेहि हिय-चित हर्षे।
      विह्वल मन न आघात-कहो, क्या रह पाओगे?

इन्होंने चुरायी...



इन्होंने चुरायी हैं नज़रें जो मुझसे,
मेरा गीत कोई न इनके लिए है।
इन्हें ना मयस्सर हो ग़ज़ले मोहब्बत-
न संगीत कोई अब इनके लिए है।। इन्होंने चुरायी....
      इन्हें अब ना कहना कि ये महज़बीं हैं,
      इन्हीं की बदौलत ये मौसम  हसीं  है।
       इन्हें क्या है लेना अब जज़्बये गुलों से-
       गुलों की मोहब्बत ना इनके लिए है।।इन्होंने चुरायी..
कोई जा के कह दे बहारों से इतना,
कि बागों में फूलों को खिलने न दें वो।
इन्हें कर दो महरूम बहारों की ऋतु से-
बहारों की महफ़िल ना इनके लिए है।।इन्होंने चुरायी....
       कोई फ़र्क पड़ता नहीं बादलों से,
       चाँद-तारे हमेशा रहेंगे जवां ।
       छीन लो इनसे इनकी जवां चाँदनी-
       चाँदनी की चमक अब ना इनके लिए है।।इन्होंने चुरायी हैं नज़रें जो मुझसे....।।
   बेवफ़ाई किया है इन्होंने सुनो,
  सिला बेवफ़ाई का इनको मिले।
 चैन इनको मिले ना कभी ऐ ख़ुदा!
 मीत की प्रीति जग में न इनके लिए है।।इन्होंने चुरायी हैं....।।

तिल-तिल घुटन में रह के...


तिल-तिल घुटन में रह के बितायी है ज़िन्दगी,
जब-जब गिरे हैं हमको उठायी है ज़िन्दगी।
फिर भी न हो यकीं तो हवाओं से पूछ लो-
तूफ़ान में भी हमने सजायी है ज़िन्दगी।।
        मौसम की बेरुख़ी ने सताया है रात-दिन,
        बरसात ने भी जलवा दिखाया है रात-दिन।
       हुलास लिए दिल में मगर बादलों जैसा-
        मन्ज़िल पे हमें अपनी पहुंचायी है जिंदगी।।
जब भी किसी को हमने चाहा है प्यार से,
हम पा सके उसे ना दुनिया के वार  से।
जैसे ही हमपे लोगों ने कीचड़ उछाला है -
दामन पे पड़े दाग़ मिटाई है  ज़िन्दगी ।।
       प्रायः घनेरे बादल ग़मों के  घिरे  हैं ,
        बेसुरी सी मन में कोई राग  छेड़े हैं।
        बेआसरा,ऐसे में कोई बात न हो जाय-
         टूटने से हमको बचाई है  ज़िन्दगी ।।
ज़िन्दगी अच्छी-बुरी हो चाहे जो बसर,
हर हाल में यह अपनी रहती है रहगुजर।
मानो तमाम शाम रुलायी है यह  हमें -
सुबहें हैं बेशुमार जब हँसाई है  जिंदगी।।
       ज़िन्दगी ख़ुदा की सदा शुक्रगुज़ार है,
       रब ने किया इसी से जग को गुलजार है।
        है क़ाबिले तारीफ़ इसकी कर्ज अदायगी-
        ख़ुद मौत को गले से लगायी है  ज़िन्दगी।।
क़यामत के बाद कौन आता यहाँ पे है,
मुश्किल बहुत है जानना, जाता कहाँ पे है।
गर नामो-यश रह जा बाद-ए-क़यामत तो-
समझो, यही बस कमायी है  ज़िन्दगी ।।

इक मोड़ ज़िन्दगी में...


इक मोड़ ज़िन्दगी में,
आया है आज  मेरी।
ख्वाबों की रोशनी को-
ढक ली निशा अंधेरी।।
                सूरज की जिस किरन पे,
                मुझे था बड़ा भरोसा।
                 धूमिल भई किरन वो-
                  छायी घटा  घनेरी।।
सरिता जो बह रही थी,
आशा-उमंग की उर में।
बहने लगी शिथिल वो-
गिरि-खण्ड पा करेरी।।
               कलरव जो पंछियों के,
               अबतक रहे सुहावन।
                मायूस कर  दिए वो-
                बीती व्यथा  उकेरी।।
पर्वत पे उड़ते बादल,
मनमीत जो थे   मेरे।
अब  तो नहीं  बरसते-
रूखी गली  है   मेरी।।
              मेरी ज़िंदगी  का  उपवन,
              फूलों  से महँके  महँ-महँ।
               यह आस थी हृदय  में-
               कि  चहके  चमन-फुलेरी।।
ले  आस  जी  रहा  हूँ,
विश्वास  जी  रहा   हूँ।
छट  जायेगा  अंधेरा-
रवि,रश्मि  पा  के  तेरी।।
       इक मोड़  ज़िन्दगी  में....।।

गर गिरे को उठा दें तो...


काम को,क्रोध को,लोभ को,मोह को,
गर जहां से मिटा दें तो क्या बात है।
राह में जो गिरा,गिर के उठ ना सका-
 गर गिरे को उठा दें तो, क्या बात है।।
      रोज जीते हैं हम सिर्फ़ अपने लिये,
      ऐसा जीना भला कैसा जीना हुआ।
     सिर्फ़ तन के लिये ना,वतन के लिये,,
     जो जिये हम यहां गर तो,क्या बात है।।
                         गर गिरे को उठा दें तो....
इक बादल उठा चाँद को ढक लिया,
चाँद फिर भी अंधेरे में रोशन रहा।
इस तरह गर्दिशे ग़म तो आते ही हैं,
दोस्ती इनसे कर लें तो,क्या बात है।।
                    गर गिरे को उठा दें तो....
    जो जनम ले लिया जो यहां आ गया,
   सबके जीने का हक़ है बराबर यहां।
   हक़ बराबर रहे, है ये ख्वाहिशे ख़ुदा,
   आदमी मान ले गर तो,क्या बात है।।
              गर गिरे को उठा दें तो....
बात तो बात है बात में कुछ नहीं,
बात ही बात में बात हो जाती है।
बात बिगड़े न पाये, यही बात है,
बात को गर बना दें तो,क्या बात है।।
     राह में जो गिरा गिर के उठ ना सका-
    गर गिरे को उठा दें तो,क्या बात है।।

Saturday, December 1, 2018

इक मोड़ ज़िन्दगी में...


इक मोड़ ज़िन्दगी में,
आया है आज  मेरी।
ख्वाबों की रोशनी को-
ढक ली निशा अंधेरी।।
                सूरज की जिस किरन पे,
                मुझे था बड़ा भरोसा।
                 धूमिल भई किरन वो-
                  छायी घटा  घनेरी।।
सरिता जो बह रही थी,
आशा-उमंग की उर में।
बहने लगी शिथिल वो-
गिरि-खण्ड पा करेरी।।
               कलरव जो पंछियों के,
               अबतक रहे सुहावन।
                मायूस कर  दिए वो-
                बीती व्यथा  उकेरी।।
पर्वत पे उड़ते बादल,
मनमीत जो थे   मेरे।
अब  तो नहीं  बरसते-
रूखी गली  है   मेरी।।
              मेरी ज़िंदगी  का  उपवन,
              फूलों  से महँके  महँ-महँ।
               यह आस थी हृदय  में-
               कि  चहके  चमन-फुलेरी।।
ले  आस  जी  रहा  हूँ,
विश्वास  जी  रहा   हूँ।
छट  जायेगा  अंधेरा-
रवि,रश्मि  पा  के  तेरी।।
       इक मोड़  ज़िन्दगी  में....।।

तूफ़ान में भी हमने...


तिल-तिल घुटन में रह के बितायी है ज़िन्दगी,
जब-जब गिरे हैं हमको उठायी है ज़िन्दगी।
फिर भी न हो यकीं तो हवाओं से पूछ लो-
तूफ़ान में भी हमने सजायी है ज़िन्दगी।।
        मौसम की बेरुख़ी ने सताया है रात-दिन,
        बरसात ने भी जलवा दिखाया है रात-दिन।
       हुलास लिए दिल में मगर बादलों जैसा-
        मन्ज़िल पे हमें अपनी पहुंचायी है जिंदगी।।
जब भी किसी को हमने चाहा है प्यार से,
हम पा सके उसे ना दुनिया के वार  से।
जैसे ही हमपे लोगों ने कीचड़ उछाला है -
दामन पे पड़े दाग़ मिटाई है  ज़िन्दगी ।।
       प्रायः घनेरे बादल ग़मों के  घिरे  हैं ,
        बेसुरी सी मन में कोई राग  छेड़े हैं।
        बेआसरा,ऐसे में कोई बात न हो जाय-
         टूटने से हमको बचाई है  ज़िन्दगी ।।
ज़िन्दगी अच्छी-बुरी हो चाहे जो बसर,
हर हाल में यह अपनी रहती है रहगुजर।
मानो तमाम शाम रुलायी है यह  हमें -
सुबहें हैं बेशुमार जब हँसाई है  जिंदगी।।
       ज़िन्दगी ख़ुदा की सदा शुक्रगुज़ार है,
       रब ने किया इसी से जग को गुलजार है।
        है क़ाबिले तारीफ़ इसकी कर्ज अदायगी-
        ख़ुद मौत को गले से लगायी है  ज़िन्दगी।।
क़यामत के बाद कौन आता यहाँ पे है,
मुश्किल बहुत है जानना, जाता कहाँ पे है।
गर नामो-यश रह जा बाद-ए-क़यामत तो-
समझो, यही बस कमायी है  ज़िन्दगी ।।

इन्होंने चुरायी...


इन्होंने चुरायी हैं नज़रें जो मुझसे,
मेरा गीत कोई न इनके लिए है।
इन्हें ना मयस्सर हो ग़ज़ले मोहब्बत-
न सङ्गीत कोई अब इनके लिए है।। इन्होंने चुरायी....
      इन्हें अब ना कहना कि ये महज़बीं हैं,
      इन्हीं की बदौलत ये मौसम  हसीं  है।
       इन्हें क्या है लेना अब जज़्बये गुलों से-
       गुलों की मोहब्बत ना इनके लिए है।।इन्होंने चुरायी..
कोई जा के कह दे बहारों से इतना,
कि बागों में फूलों को खिलने न दें वो।
इन्हें कर दो महरूम बहारों की ऋतु से-
बहारों की महफ़िल ना इनके लिए है।।इन्होंने चुरायी....
       कोई फ़र्क पड़ता नहीं बादलों से,
       चाँद-तारे हमेशा रहेंगे जवां ।
       छीन लो इनसे इनकी जवां चाँदनी-
       चाँदनी की चमक अब ना इनके लिए है।।इन्होंने चुरायी हैं नज़रें जो मुझसे....।।
   बेवफ़ाई किया है इन्होंने सुनो,
  सिला बेवफ़ाई का इनको मिले।
 चैन इनको मिले ना कभी ऐ ख़ुदा!
 मीत की प्रीति जग में न इनके लिए है।।इन्होंने चुरायी हैं....।।

सिर्फ़ तेरा...



चित ठिकाने नहीं, दिल ये माने नहीं,
सिर्फ़ तेरा नज़ारा नज़र आ रहा।
क्या करूँ ध्यान किसका बता मैं धरूँ?
सिर्फ़ तेरा सहारा नज़र आ रहा।।
         तेरे  चञ्चल नयन,शोख़ चितवन का फ़न,
         वो अदाएं,सदायें कहाँ सब  गयीं ?
         देखते -देखते ,देखो,ये क्या हुआ?
         डूबता एक सितारा नज़र आ रहा।।सिर्फ़ तेरा....
उजड़े मंज़र सभी,ताने खंज़र सभी,
वो हवायें, फ़ज़ाएँ सभी हैं खड़ी ।
लड़खड़ाते क़दम डीग न पायें कहीं,
टूटता ग़म का मारा नज़र आ रहा
                                           सिर्फ़ तेरा....
         ज़िन्दगी के सफ़र की डगर अब कठिन,
         वो खताएं,सज़ाएं मुबारक हुयीं।
         अश्क़ पीता हुआ, दिल का टूटा हुआ,
         वक़्त का एक मारा नज़र आ रहा।।सिर्फ़ तेरा....
आशिक़ी का सबब जानेमन,क्या कहें!
वो वफ़ाएँ ,ज़फाएँ बनीं सब यहाँ।
दुनियावाले न मानें कोई ग़म नहीं,
खार ही गुल में सारा नज़र आ रहा।।
              सिर्फ तेरा सहारा नज़र आ रहा।।