Wednesday, October 26, 2016

दर पे आये हैं ...






जानेमन, नाशरम कीजिये,
दर पे आये हैं, हम पे करम कीजिये  ॥

आपका हूँ मैं आशिक़ पुराना,
जाने दुनियाँ ये सारा ज़माना ।
अपने आशिक़ पे थोड़ा रहम कीजिये ॥

                                           दर पे आये .... ॥
ये ज़मीं, आसमाँ औ सितारे,
आप ही पे सभी हम हैं वारे ।
मेरे ग़मख़्वार, अब ना सितम कीजिये ॥
                                           दर पे आये .... ॥
आप ही से है सारी खुदायी,
रोशनी, रागिनी, ये सहर जो है आयी ।
अब तो जाने चमन, ना भरम कीजिये ॥
                                            दर पे आये .... ॥
ज़िन्दगी आप बिन है अधूरी,
जो मिले आप तो हो ये पूरी ।
अब तो मिलने का कोई जतन कीजिये ॥
                                            दर पे आये .... ॥

  

Saturday, August 25, 2012

आँखों - आँखों में....


आज पूरी मेरे मन की मुराद हो गयी,
आँखों-आँखों में जाने क्या बात हो गयी?

बादे मुद्दत हुज़ूर आप ऐसे मिले,
जैसे अम्बर से धरती मिली हो गले ।
जो अधूरी थी, पूरी वो आस हो गयी ।।

आँखों - आँखों में.... ।।

आप महफ़िल में आये, बड़ी शुक्रिया,
अपना जलवा दिखाये, बड़ी शुक्रिया ।
वाह ! किस्मत मेरी, मुलाकात हो गयी ।।

आँखों - आँखों में..... ।।

बज़्मे दिल में तो साया शबेगम का था,
मेरा अपना कोई जग में हम-दम न था ।
अब तो बिछुड़ी किरन मेरे साथ हो गयी ।।

आँखों - आँखों में..... ।।

ना उम्मीदों में डूबा रहा मेरा मन,
उलझनों में झुलसता रहा तन-बदन ।
अब तो मातम की महफिल बारात हो गयी ।।

आँखों - आँखों में..... ।।




Wednesday, June 13, 2012

अच्छा नहीं लगता...


तड़पना है अगर लिख़ा मेरी तक़दीर में तो,
बहाना आसुओं का इस तरह अच्छा नहीं लगता।
बरसना एक भी क़तरा नहीं जो आब का तो,
गरजना बादलो का इस तरह अच्छा नहीं लगता।।

अच्छा नहीं लगता वो कलरव पंछियों का,
जिन्हें वो छेड़ते हैं मस्त हो शामो-सहर।
शिकारी जाल है फैलाये अगर चारों तरफ तो,
फुदकना पंछियों का इस तरह अच्छा नहीं लगता ।।

खिले हों फूल गुलशन में,जो लबरेज़ खुशबू से,
हवा का बेरहम बहना कभी अच्छा नहीं लगता।
सनम का रूठ के जाना,नहीं आना अगर मुमकिन,
सवरना,प्रेमिका का इस तरह अच्छा नहीं लगता ।।

अच्छा नहीं लगता बिछड़ना रौशनी का दीप से,
मुकरना अपने वादों से कभी अच्छा नहीं लगता।
 ख़ुदा ने जो दिया जीवन तुम्हें इंसान का,
बहकना पी के गिरना इस तरह अच्छा नहीं लगता।।

अच्छा नहीं लगता सदा अच्छाई का रहना,
बदलना उसको भीचाहिए बुराई जिसमे रहती है।
वफ़ा का बेवफ़ा संग प्यार का बंधन नहीं झूठा,
ठहरना देर तक इनका मगर अच्छा नहीं लगता।।



रोशन ये ज़िन्दगी है मुहब्बत की आग से...


लगती है घर में आग जब,घर के चिराग से,
कुदरत का है जवाब समझो,इतेफाक़ से ।।

होती है उलझनों से जब परेशान ज़िन्दगी,
आता है कोई फरिश्ता,देखो,तपाक से ।।

महबूब का मरना,भला,इसका है क्या गिला,
ऐसी फ़िज़ूल बात को,निकालो दिमाग से ।।

करनी पड़ेगी लाख जतन,बेदाग़ रह सको,
वरना,बचा सका न कोई,दामन को दाग से ।।

मिलते हैं सुर से सुर तभी,जब दिल से दिल मिले,
रोशन ये ज़िन्दगी है मुहब्बत की आग से ।।

तबस्सुम....


               
                   उनके होंठो पे तबस्सुम,
                   या खुदा ! क्या नूर था !
                   इक परी के रूप का -
                   सुरुर ही सुरूर था ।

निष्कपट चितवन,चपल,
भोली अदा-स्वर्णाभ तन।
कोमल कपोल की सुर्ख़ियों में-
हुस्न बेग़रूर था ।।

                   उस रोज़ उनका मेरे घर,
                   आना हुआ जब दफ्फ़तन ।
                   सजदा किया दिल झुक गया-
                   जो अबतलक मग़रूर था ।।

जी में आया उनसे अब मैं,
क्या कहूँ-क्या ना कहूँ ।
कह दूँ क्या मैं लुट गया-
कि मेरा क्या क़ुसूर था ।।

                   चाँद रोशन आसमां में,
                   दामिनी दमके जहाँ ।
                   जो पलक झपके ही दमका-
                   वो बदन भर-पूर था।।
                   या खुदा !क्या नूर था ।।


Sunday, June 10, 2012

बेफिक्र ज़िन्दगी...


बेफिक्र ज़िन्दगी को बिताना है अति भला ।
गर रोड़े आयें राह में तो करना ना गिला ।।
जब आये ग़म का दौर तो ना धर्य छोड़ना,
खोना नहीं विवेक जंग से मुंह न मोड़ना ।
जीवन का है ये फलसफ़ा,समझ लो दोस्तों -
जिसने जीया है इस तरह,उसी को सब मिला ।।
                                         गर रोड़े....।।
पर्वत-शिखर पे झूम के बादल हैं बरसते,
नदियों के जल-प्रवाह तो थामे नहीं थमते।
जिन शोख़ियों से शाख पे निकलती हैं कोपले -
थमने न पाये ऐसा कभी शोख़ सिल-सिला ।।
                                        गर रोड़े ....।।
कुदरत का ही कमाल है ये सारी कायनात,
होता कहीं पे दिन है तो रहती कहीं पे रात ।
गुम होते नहीं तारे चमका करे ये सूरज -
महके है सगरो वादी ये फूल जो खिला ।।
                                       गर रोड़े ....।।
जब नाचता मयूर है सावन में झूम के ,
कहते हैं,होती वर्षा तब झूम -झूम के ।
जो श्रम किया है तुमने वो फल अवश्य देगा -
मेहनतकशों के श्रम का मीठा है हर सिला ।।
                                      गर रोड़े ....।।

Sunday, January 29, 2012

मेरा नन्हा सा दिल ....

मेरा नन्हा सा दिल तुमको चाहे सौ-सौ बार ।
तूँ मिले, मिले ना मुझको कुर्बां तुझ पे सभी बहार  ।।
मेरा नन्हा सा दिल .... ।।

जब से नयना चार हुए हैं, दिल मेरा हो गया घायल,
घायिल मनवां बन-बन ढूंढे तुझको बारम्बार -
मेरा नन्हा सा दिल .... ।।

तेरी साँवरी सूरत बस गयी मन में प्यारी मूरत,
मन-वैरागी रीझा, जबसे देखा पहली बार-
मेरा नन्हा सा दिल .... ।।

चाँद सा मुखड़ा प्यारा- प्यारा, नील झील सी आँखें,
रस लोभी मन भंवरा मेरा तेरी करे पुकार -
मेरा नन्हा सा दिल .... ।।

तूँ जबसे मन भाई सजनी! स्वर्ग हो गया जीवन,
बिना प्यार के जीवन सूना, सूना सब संसार -
मेरा नन्हा सा दिल .... ।।

निगाहे उल्फ़त

जब से निगाहे उल्फ़त डाली है आपने,
लगे, चाँद बस गया हो ज़मीं के माकन में ।।
अम्बर की किस पारी से कहाँ कम जनाब हैं,
गर है कोई जहाँ में तो बस आप-आप हैं ।
महका दिया फ़जां को चेहरा गुलाब ने ।।
जब से निगाहे .... ।।

हर एक अदा तो आपकी शायर का ख्व़ाब है,
मिल जाये सबक प्यार का तूँ वो किताब है ।
लब को सिखाया गाना खिलते शबाब ने ।।
जब से निगाहे .... ।।

सूना था मन का मंदिर सदियों से बिन तिहारे,
बिन देवता के सजदा किसको करे पुजारी ।
रोशन किया ये महफ़िल दमकते चराग़ ने ।।
जब से निगाहे .... ।।

उजड़े मेरे चमन की बहाराँ हुज़ूर हैं,
धरती पे आसमाँ की, जन्नत की हूर हैं ।
खुशबू है दी खिज़ां को मल्काये बहार ने ।।
जब से निगाहे .... ।।
 

Thursday, December 1, 2011

ऐसी माटी ...


भारत-माता के वीर सपूतों,
अपनी धरती का करलो नमन |
ऐसी माटी तुम्हे न मिलेगी,
कर लो टीका समझ इसको चन्दन ||

इसके उत्तर में गिरिवर हिमाद्री
जैसे प्रहरी हो इसका अहर्निशी
चाँदनी की धवलिमा लिए....
दक्षिनोदधि करे पादसिंचन || ऐसी माटी ..... ||

इसकी प्राची दिशा में सुशोभित,
गारो, खासी, मेघालय, अरुणाचल |
इसके पश्चिम निरंतर प्रवाहित,
सिन्धु-सरिता व् धारा-अदन || ऐसी माटी ..... ||

शीश-कश्मीर ऐसे सुशोभित,
स्वर्ग-नगरी हो जैसे अवनि पर |
गंगा-कावेरी जल उर्मियों से,
देवता नित करें आचमन || ऐसी माटी ..... ||

पुष्प अगणित खिलें उपवनों में,
मृग कुलाचें भरें नित वनों में |
वर्षपर्यंत रितुरागमन है,
लोरी गाये चतुर्दिक पवन || ऐसी माटी .... ||

अपनी धरती का गौरव रामायण,
सारगर्भित वचन भगवदगीता |
मार्गदर्शन करें नित अजानें,
वेड-बाइबिल का अदभुत मिलन || ऐसी माटी .... ||

इसकी गोदी में खेले शिवाजी,
राणा, गांधी, जवाहर, भगत सिंह |
चंद्रशेखर की है सरज़मीं ये,
बाल गंगा तिलक का वतन || ऐसी माटी ..... ||





चलो, एक गाँव बसायें ....



राग-द्वेष से दूर,
चलो, एक गाँव बसायें |
जहाँ न हो कोई भीरु,
चलो, एक गाँव बसायें ||

सघन वृक्ष की छाँव जहाँ हो,
पोखर, नदी, तालाब जहाँ हो |
निर्झर-जल भर-पूर,
चलो, एक गाँव बसायें ||

पंछी-कलरव तान जहाँ हो,
सुघड़, सुखद विहान जहाँ हो |
मिले प्रकृति का नूर,
चलो, एक गाँव बसायें ||

निर्भय, निडर रहें जहाँ सब जन,
विलसे सुख-सुकून जहाँ कण-कण
ठुमके मन-मयूर,
चलो, एक गाँव बसायें ||

वाणी मधुर-मिठास भरी हो,
कुण्ठित मन न निराश कोई हो |
ग़म हो काफ़ूर,
चलो, एक गाँव बसायें ||

सुख-दुःख हो जहाँ सबका अपना,
ध्येय एक हो मिल-जुल रहना |
नहीं कोई हो क्रूर,
चलो, एक गाँव बसायें || 

Wednesday, November 30, 2011

हम महकते-महकते गए ...

जब दरख्तों पे पत्ते उगे,
फूल खिलते ही खिलते गए |
मन में भीनी महक जब बसंती-
हम महकते-महकते गए ||

ख़ुमारी का छाया था आलम,
बेख़बर थीं हवाएं, फज़ाएँ |
बेख़ुदी का वो आलम ना पूछो-
हम बहकते-बहकते गए ||

शोख़ियों से भरी थीं कली सब,
मस्तियों में सनी सब गली |
सुर्ख़ शाख़ों पे बैठे पखेरू-
सब चहकते-चहकते गये ||

नूर था, रागिनी की खनक थी,
चाँद की चाँदनी थी मचलती |
शोख़-चंचल हसीना सी ऋतु में-
हम मचलते-मचलते गये ||

उनसे नज़रे हुईं चार जब,
वक़्त मानो ठहर सा गया |
झील के जैसे ठहराव में-
हम सरकते-सरकते गये ||

बेख़ुदी का वो आलम न पूछो-
हम बहकते-बहकते गये ||

Tuesday, November 29, 2011

सन्देश

राष्ट्र को हमें बचाना है, प्यार का सबक सिखाना है |
कपटी-कुटिल-रक्त-लोलुप को राह दिखाना है ||
राष्ट्र को .... |

फैला ये आतंक विश्व में, करता तांडव-नृत्य है |
अमन-चैन का दुश्मन यह, एक खतरनाक कुकृत्य है |
मुह बाये आतंकवाद को, मार भगाना है ||
राष्ट्र को .... |

दुश्मन के नापाक इरादे, कामयाब नहीं होंगे अब |
लाल देश की माटी खातिर, दाग़दार नहीं होंगे अब
खोया जो सम्मान था पहले-उसको पाना है ||
राष्ट्र को .... |

क्या छोटा-क्या बड़ा यहाँ पे, सब तो भाई-भाई हैं |
मानवता बस एक धर्म है, जानो येही सच्चाई है |
जाति-पांति व वर्ग-भेद को, जड़ से मिटाना है ||
राष्ट्र को .... |

गाँव-गाँव में, नगर-नगर में, बस्ती-कुनबा डगर-डगर में |
नदी-तालाब की लहर-लहर में, सागर की हर भंवर-भंवर में |
प्रेम-भाव अरु श्रद्धा का-परचम फहराना है ||
राष्ट्र को .... |

जीवन धन्य वही जो, न्योछावर निज माटी पे |
जल-थल-अम्बर अपने वतन की, सबसे प्यारी थाती पे |
वतन-परस्ती की मस्ती को- फिर से लाना है ||
राष्ट्र को हमें बचाना है |

आवो मिलकर करें सर्जना ...

आवो, मिलकर करें सर्जना ऐसे हिन्दुस्तान की,
जिसमे श्रद्धा पले-बढे नित, कुदरत औ भगवान् की |
वृक्ष देवता माना जाये, हरियाली की पूजा हो,
बाग़-बगीचा-खेत-कियारी, अन्न-फूल-फल उपजा हो |
पशु-विहार औ ताल-तलैया, पंछी-कलरव तान की-
आवो, मिलकर करें सर्जना .... ||

सत्य-अहिंसा ध्येय हो जिसका, 'आज़ादी' जो समझ सके,
मानवता बस एक धर्मं हो, 'बरबादी' जो समझ सके |
समता-ममता, प्यार-मोहब्बत, करुना औ ईमान की-
आवो मिलकर करें सर्जना .... ||

रह ना जाये कोई भी रेखा, जिसमें अब गरीबी की,
छुआछूत औ भेद-भाव संग, रेखा मिटे अमीरी की |
बजे दुन्दुभी जिसमें हर-पल, साक्षरता-अभियान की-
आवो, मिलकर करें सर्जना .... ||

युवा बने जिस मुल्क का गौरव, ऐसा देश हमारा हो,
करें हौसला पस्त तिमिर के, रौशन जग सब सारा हो |
वतन-परस्ती के जज़्बे की, आन-बान औ शान की-
आवो, मिलकर करें सर्जना .... ||

महंगाई की मार न हो जहाँ, सबकी रोजी बनी रहे,
बच्चा अपना बचपन जीये, सबकी रोटी पकी रहे |
नारी-शिक्षा और तरक्की, संसाधन-सम्मान की-
आवो, मिलकर करें सर्जना .... ||

Tuesday, September 8, 2009

आज तक समझे नही.....

आज तक समझे नहीं हम क्या कहानी प्यार की?
आलमे मस्ती है ये, या है ग़ज़ल इनकार की॥
अलमस्त भौरों के तराने कुछ नहीं बतला सके।
सागरों मीना के दीवाने नहीं बतला सके।
बतला सकीं नज़रें न वो मेरे यार की सरकार की॥ आज तक समझे ..... ॥

कितने तो ये कहकर गए इसमें खुदा की शान है,
जान है, ईमान है, इंसान की ये आन है।
कुछ शायरों ने है कहा, ये किताब है बहार की॥ आज तक समझे .........॥

कुछ ने सदा-ए-इश्क को जन्नत का है दर्जा दिया,
शोला है ये, शबनम है ये, या क्या है ये किसको पता?
कुछ रूहें कह कर गयीं, ये किताब है पतझार की॥ आज तक समझे ..... ॥

कुछ अश्क बहकर यूँ कहे, ग़म के अंजुमन का फूल ये,
कुछ हस्तियाँ मिटकर कहीं, है ज़िन्दगी की भूल ये।
कोई जो बने कहता रहे, ये तो गुफ्तगू इकरार की॥ आज तक समझे..... ॥

एक से बढ़कर एक यहाँ, हैं शायरों के मशवरे,
कुछ को समय ने खा लिया, कुछ के बने हैं मक़बरे।
यह नज़्म है यारों मेरे, किसी दर्द बेशुमार की॥ आज तक समझे ........ ॥

Sunday, September 6, 2009

कुछ पल और....

कुछ पल और ठहर जाओ,
यादों के शीश-महल में,
कुछ पल और संग में नाचो
सपनों के रंग-महल में। कुछ पल और....... ॥

साक़ी बगैर शराब तो शराब नही है
खुशबू बगैर गुलाब तो गुलाब नही है,
कुछ पल और मय पिलाओ,
महफिलों की हलचल में। कुछ पल और..... ॥

तेरे मेरे गीत मिलके राग बनेंगे,
हर साज़े दिल की जानेमन, आवाज़ बनेंगे,
कुछ पल और संग में गाओ,
चाहतों की चहल-पहल में। कुछ पल और....॥

तूँ जो मिल गए तो समझो चाँद मिल गया,
भटके कदम को उसका मुकाम मिल गया,
कुछ पल और चलते जाओ-
ज़िन्दगी के मरू-थल में। कुछ पल और..... ॥

जीवन-बगिया

जीवन-बगिया महकेगी कैसे तूँ जो संग नही,
फूलों का बिस्तर चुभे जैसे नश्तर कोई उमंग नही।
जीवन-बगिया....... ॥

सावन भी आया, छायीं घटायें,
चंचल बहे पुरुवायी,
फ़िर भी नही मेरे मन को चैन है,
ऋतु भी बहारों की आई।
रंगों में कोई रंग नही-
जीवन-बगिया........॥

कोयल के मीठे बोल न भाये,
न भाये पपीहा की बानी,
चंदन का लेपन जलन है अगन की,
बूढी भई अब जवानी,
वसूलों का कोई ढंग नही-
जीवन-बगिया........ ॥

बादल व् बरखा, पंछी व् पर्वत,
सागर व् सरिता, सुर सरगम सब,
फीके पड़ गए सारे नज़ारे,
भाये न, बरसे अमरित भी अब,
अब तो उड़े मन-विहंग नही-
जीवन-बगिया.........॥

भौरे है मायूस, कलियाँ उदासी,
साजन की गलियाँ हैं सूनी।
अम्बर पे सब हैं सितारे व् सूरज,
फीकी मगर रौशनी-
सागर में कोई तरंग नही॥
जीवन-बगिया......... ॥

Saturday, September 5, 2009

निज धाम

उड़ते हुए पंछी से अब लेना हमें क्या चाहिए !
ये धरा अपनी ही है, बस इसे अपनाइए ॥ ये धारा ....... ॥

कामना तो कामना है, कामना बस कामना,
कामना के पर कतर, धरणी-धरण बन जाइये ॥ ये धारा...॥

कल्पना माना हमें कुछ दूर तक ले जायेगी,
यथार्थ है आदर्श अपना, बस इसे अपनाइए॥ ये धारा......॥

मुमकिन नही कहीं और जाना छोड़कर निज धाम को।
स्वर्ग से भी श्रेष्ठ सुख, निज धाम में ही पाइए ॥ ये धारा...॥

होना विमुख निज कर्म से नहिं धर्म है मनुष्य का,
संघर्ष ही कटु सत्य है, संघर्षरत हो जाइये॥ ये धारा.......॥

जब तलक है ज़िन्दगी, जीना हमें जीना ही है,
जीना तो तब जीना हुआ, कुछ कर अमर हो जाइये॥ ये धारा....॥

Thursday, September 3, 2009

सलामत रहे यार तेरा जहाँ में....

तुझे हो मुबारक तेरा प्यारा दिलबर,
मेरे दिल को कोई शिकायत नही है।
चली जा कली बन के तूँ उस चमन की,
मेरे दिल-चमन को कोई शिकायत नही है॥

दुनिया तो बगिया है ज़िन्दगी की,
शम्मा है मुहब्बत की रौशनी की।
चली जा कली बन के तूँ उस चमन की,
मेरे दिल को कोई शिकायत नही है॥ चली जा...... ॥

मेरा क्या ठिकाना, मैं एक दीवाना,
कभी हूँ हकीक़त कभी हूँ फ़साना।
पतंगा जला है शम्मा की लपट से,
मुहब्बत के जग की रवायत यही है॥ चली जा...... ॥

समझना हमें एक झोंका पवन का,
कि उड़ता हुआ एक पंछी गगन का।
सलामत रहे यार तेरा जहाँ में,
खुदा को भी मेरी हिदायत यही है॥ चली जा......... ॥

Wednesday, September 2, 2009

रात के जब सितारे चले.....

रात के जब सितारे चले,
मेरे अरमान सारे चले।
रह गयी बज़्म सूनी की सूनी,
मेहमान सारे चले॥

ढल गया चाँद प्यारा सलोना,
मिट गया आज जीवन खिलौना॥
आस टूटी की टूटी रही,
मेरे गमख्वार सारे चले॥
रात के जब सितारे चले.......... ॥

थम गया सिल-सिला हसरतों का,
हो गया खात्मा महफिलों का।
प्यासे अरमान प्यासे रहे,
कहाँ सरकार मेरे चले?
रात के जब सितारे चले......... ॥

ए खुदा ! क्या तुझे है मिला
तोड़कर के मेरा हौसला?
मर गया मैं यहाँ जीते जी,
दिल के गुलज़ार सारे चले॥
रात के जब सितारे चले.........॥

Tuesday, September 1, 2009

ये पिशाचन! अगन जो जली

राम ! नगरी तेरी हो गई,
अब समर साधना-स्थली।
थम गयीं घंटियाँ मंदिरों की,
बज उठी वाद्य रन-मण्डली॥ राम ! नगरी...... ॥

भावना के सुमन शुष्क हो,
भूस्खलित हो सिसकने लगे।
दीप आस्था के जो प्रज्वलित थे,
बुझ-बुझ के सिमटने लगे।
शान्ति, सद्भाव की बीथियों में,
वायु आक्रोश की बह चली॥ राम ! नगरी...... ॥

शांत, शीतल सलिल सरिता सरयू,
हो गया अब उदधि क्रोध-संहार का।
प्रीति-सौहार्द बोझिल तरंगे,
बन गयीं केन्द्र अब तप्त अंगार का।
इनमे भक्तों व् श्रद्धालुओं की,
तर्पण करते जलीं अंजली॥ राम ! नगरी....... ॥

राज-पथ पर पड़े क्षत-विक्षत शव,
साक्ष्य हैं क्रूरता, निम्नता के।
भूल जाने हुई किस पटल से,
पलटे अध्याय सब शिष्टता के।
हो गई भस्म अब अस्मिता भी,
ये पिशाचन ! अगन जो जली॥
राम ! नगरी तेरी हो गई, अब समर साधना-स्थली॥