Saturday, July 27, 2019

नायाब सुख है देता...



श्रृंगार और सावन दोनों का मेल अनुपम,
गोरी औ गाँव-आँगन सँवरे जब बरसे झम-झम।
तट-बन्ध तक उमड़ के जब भी है बहती सरिता-
नायाब सुख है देता पानी-पवन का संगम।।
     कजरी के बोल रसमय,लयबद्ध मोर-नर्तन,
सीवान-गाँव-गलियों में,चारो तरफ है नन्दन।
अँगड़ाइयाँ हैं लेतीं जब भी फुहारें रिम-झिम-
लगता है करने नर्तन,विरही हृदय भी छम-छम।।        
                          नायाब सुख है देता.........।।
मन का पखेरू चाहे उड़ के गगन को छू ले,
अमरित जो नभ से टपके,पी के गमों को भूले।
उड़-उड़ के बादलों सँग, इठला के जग से कह दे-
सावन न हो तो तेरा,कोई नहीं है दम-ख़म।।
                           नायाब सुख है देता.......।।
धानी चुनर सी लहरें,खेतों में सारी फसलें,
जी चाहता झपट सुख,सारा धरा का धर लें।
सावन के सांवरेपन में,निश्चित है बात कुछ तो-
रहता भिगोता बादल, आँचल अवनि का हर-दम।।
                          नायाब सुख है देता........।।
झूले का यह महीना,ऋतुओं का है नगीना,
जल दे के इस धरा को,करता सुखी है जीना।
इसकी कृपा से धरती,सोना सदा उगलती-
आबो-हवा हो शीतल,जाता है जिसमे मन रम।।    
                           नायाब सुख है देता.......।।
अभिषेक जल से होता,सावन में श्री शिवा का,
जल-वृष्टि का महीना यह,शीतल पवन-हवा का।
है प्रेमियों व भक्तों का अद्भुत यही ठिकाना-
इसे भाव-गीत भाये,भोले की बोली बम-बम।।
      नायाब सुख है देता,पानी-पवन का संगम।।

लिया है समझ जो...



लिया है समझ जो किताबों की भाषा,
दरख़्तों की भाषा,परिन्दों की भाषा।
वही असली प्रेमी है क़ुदरत का मित्रों-
उसे ज़िन्दगी में न होती  निराशा।।
                 लिया है समझ जो.......।।
बहुत ही नरम दिल का होता वही है,
नहीं भाव ईर्ष्या का रखता कभी है।
बिना भ्रम समझता वो इन्सां मुकम्मल-
सरिता-समन्दर-पहाड़ों की  भाषा।।
                  लिया है समझ जो.......।।
जैसा भी हो, वो है जीता ख़ुशी से,
न शिकवा-शिकायत वो करता किसी से।
ज़िन्दग़ी को ख़ुदा की अमानत समझता-
लिए दिल में रहता वो अनुराग-आशा।।
                 लिया है समझ जो........।।
खेत-खलिहान,बागों-बगीचों में रहता,
सदा नूर रब का अनूठा है  बसता।
यही राज़ जिसने है समझा औ जाना-
मुश्किलें भी न उसको हैं करतीं हताशा।।
                 लिया है समझ जो........।।
हरी घास पे सारी शबनम की बूंदें,
एहसास मख़मल का दें आँख मूंदे।
रवि-रश्मियों में नहायी सुबह तो-
होती प्रकृति की अनोखी परिभाषा।।
                 लिया है समझ जो........।।
हक़ मालिकाना है क़ुदरत का केवल,
बसाना-गवांना बस अपने ही सम्बल।
गर हो गया क़ायदे क़ुदरत उलंघन-
ज़िन्दगी तरु कटे बिन कुल्हाड़ी-गड़ासा।।
                लिया है समझ जो.........।।
प्रकृति से परे कुछ नहीं है ये दुनिया,
प्रकृति से ही बनती-बिगड़ती है दुनिया।
नहीं होगा सम्मान विधिवत यदि इसका-
जायगा यक़ीनन थम, ये जीवन-तमाशा।।

निष्काम कर्म-फल होता...



होती है ज़रूरत त्याग की रिश्तों को निभाने में।
निष्काम कर्म-फल होता है अति मीठा खाने में।।
     निज सुख-चिन्तन होता पशुवत दुनिया माने है,
     पर-उपकार ही लक्ष्य हो जिनका सन्त-सुजाने हैं।
     सुख पाती माँ स्वयं जाग सुत-सुता सुलाने में।।
                                निष्काम कर्म-फल होता.....।।
खा प्रहार पत्थर का तरुवर देता फल मनचाहा,
कभी न कहता सिंधु नीर दे,तुमने कहर है ढाहा।
करे कृपणता कबहुँ न नीरद जल बरसाने में।।
                                निष्काम कर्म-फल होता.....।।
बिना कहे नित पवन है बहता जीव-जन्तु-हितकारी,
करके हरण निशा-तम चन्दा बनता जग-सुखकारी।
स्वयं को माने धन्य भाष्कर,दिवस-उजाला लाने में।।
                                निष्काम कर्म-फल होता.....।।
अन्न-सम्पदा पृथ्वी देती मुक्त हस्त से जन-जन को,
बिना मोल सुन कलरव मिलता,सुख-सुक़ून हर तन-मन को।
लिपट पतंगा दीप-शिखा से पाता सुख जल जाने में।।
                                निष्काम कर्म-फल होता.....।।
मिले इत्र सी खुशबू,हर वक्त सुगन्धित मधुवन से,
कोयल गाती गीत सुरीला,बैठ शिखा तरु उपवन से।
चन्दन करे कुठार सुगन्धित,यद्यपि कि कट जाने में।।
                                 निष्काम कर्म-फल होता.....।।
गिरि के उच्च शिखर से गिरता,जल-प्रपात मन भाये,
मेघाच्छन्न गगन को चित-मन,निरखि-निरखि हरषाये।
मिले प्रकृति को सुख असीम,निज छटा दिखाने  में।।
       निष्काम कर्म -फल होता है अति मीठा खाने में।।

Sunday, July 14, 2019

रिम-झिम हो बरसात...



रिम-झिम हो बरसात,
पिया नहीं साथ-कहो क्या रह पाओगे?
सावन की हो रात,
पिया नहीं साथ-कहो,क्या रह पाओगे?
    मेघ-गरजना से दिल दहले,
     बिजली आंख मिचौली खेले।
      लिए विरह-आघात-कहो, क्या रह पाओगे?
धरती ओढ़े धानी चुनरिया,
बलखाती-इठलाती गुजरिया।
वन-उपवन भरे पात-कहो, क्या रह पाओगे?
      सन-सन बहे पवन पुरुवाई,
       कारी बदरिया ले अंगड़ाई।
       सिहर उठे तन-गात-कहो, क्या रह पाओगे?
बस्ती-कुनबा, गांव-गलिन में,
बाग़-बग़ीचा, खेत-नदिन में।
क़ुदरत की सौग़ात-कहो, क्या रह पाओगे?
     अनुपम प्रकृति-प्रेम-रस बरसे,
      निरखि-निरखि जेहि हिय-चित हर्षे।
      विह्वल मन न आघात-कहो, क्या रह पाओगे?

किसी शक्ति ने जन्म लिया...



जब -जब पाप बढ़ा धरती पे,
किसी शक्ति ने जन्म लिया।
पाप से बोझिल इस धरती को,
पाप-फ़ांस से मुक्त  किया।।
        जीवन कभी न बच पाया है,
       झूठ के अलम्बरदारों से।
       कामी, कपटी,कुटिल,प्रलोभी,
       जुर्म के ठेकेदारों  से।
       साफ-पाक-बेबाक मोहब्ब्त,  
       जब -जब जग में रोई है।
       उसकी ही मुस्कान की ख़ातिर -
       किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
नकबजनी होती रहती है,
मन्दिर-मस्ज़िद-गुरुद्वारे में।
क्या-क्या नहीं हुईं हैं बातें,
गिरजाघर के बारे में।
इंसान बना इंसाफ़ का दुश्मन,
जब-जब इस धरती पे।
लूट-पाट-उत्पात रोकने-
किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
     लहू-लुहान जब हुई मनुजता,
     रक्त-पात चहुँ ओर हुआ।
     चन्दन जब त्यागा शीतलता,
     अमृत विष घनघोर हुआ।
     नहीं बचे जब पोथी-पन्ना,
     शिक्षा-सदन कंगाल हुआ। 
     तालीम -इल्म-रक्षार्थ जगत में-
     किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
राह सही इंसान चुनें सब।मेल-भाव से पलें-बढ़ें ।
हक़-हुक़ूक़ को ध्यान में रख के,
आपस में नहिं लड़ें-भिड़ें ।
कोई दुशासन जब-जब करता
अबला का यदि चीर-हरण।
नारी-लाज बचाने ख़ातिर-
किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
     पर्वत-शिखर, समन्दर-तट तक,
     चहुँ-दिशि विलसे, दिगदिगन्त तक।
     एक जाति हो,एक धर्म हो,
     एक भाव मानुष -मन तक।
      जब इसके विपरीत हुआ कुछ,
      नामाकूल सलूक़ हुआ कुछ।
     सुख-सुकून को क़ायम रखने-
     किसी शक्ति ने जन्म लिया।।