Sunday, July 14, 2019

रिम-झिम हो बरसात...



रिम-झिम हो बरसात,
पिया नहीं साथ-कहो क्या रह पाओगे?
सावन की हो रात,
पिया नहीं साथ-कहो,क्या रह पाओगे?
    मेघ-गरजना से दिल दहले,
     बिजली आंख मिचौली खेले।
      लिए विरह-आघात-कहो, क्या रह पाओगे?
धरती ओढ़े धानी चुनरिया,
बलखाती-इठलाती गुजरिया।
वन-उपवन भरे पात-कहो, क्या रह पाओगे?
      सन-सन बहे पवन पुरुवाई,
       कारी बदरिया ले अंगड़ाई।
       सिहर उठे तन-गात-कहो, क्या रह पाओगे?
बस्ती-कुनबा, गांव-गलिन में,
बाग़-बग़ीचा, खेत-नदिन में।
क़ुदरत की सौग़ात-कहो, क्या रह पाओगे?
     अनुपम प्रकृति-प्रेम-रस बरसे,
      निरखि-निरखि जेहि हिय-चित हर्षे।
      विह्वल मन न आघात-कहो, क्या रह पाओगे?

किसी शक्ति ने जन्म लिया...



जब -जब पाप बढ़ा धरती पे,
किसी शक्ति ने जन्म लिया।
पाप से बोझिल इस धरती को,
पाप-फ़ांस से मुक्त  किया।।
        जीवन कभी न बच पाया है,
       झूठ के अलम्बरदारों से।
       कामी, कपटी,कुटिल,प्रलोभी,
       जुर्म के ठेकेदारों  से।
       साफ-पाक-बेबाक मोहब्ब्त,  
       जब -जब जग में रोई है।
       उसकी ही मुस्कान की ख़ातिर -
       किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
नकबजनी होती रहती है,
मन्दिर-मस्ज़िद-गुरुद्वारे में।
क्या-क्या नहीं हुईं हैं बातें,
गिरजाघर के बारे में।
इंसान बना इंसाफ़ का दुश्मन,
जब-जब इस धरती पे।
लूट-पाट-उत्पात रोकने-
किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
     लहू-लुहान जब हुई मनुजता,
     रक्त-पात चहुँ ओर हुआ।
     चन्दन जब त्यागा शीतलता,
     अमृत विष घनघोर हुआ।
     नहीं बचे जब पोथी-पन्ना,
     शिक्षा-सदन कंगाल हुआ। 
     तालीम -इल्म-रक्षार्थ जगत में-
     किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
राह सही इंसान चुनें सब।मेल-भाव से पलें-बढ़ें ।
हक़-हुक़ूक़ को ध्यान में रख के,
आपस में नहिं लड़ें-भिड़ें ।
कोई दुशासन जब-जब करता
अबला का यदि चीर-हरण।
नारी-लाज बचाने ख़ातिर-
किसी शक्ति ने जन्म लिया।।
     पर्वत-शिखर, समन्दर-तट तक,
     चहुँ-दिशि विलसे, दिगदिगन्त तक।
     एक जाति हो,एक धर्म हो,
     एक भाव मानुष -मन तक।
      जब इसके विपरीत हुआ कुछ,
      नामाकूल सलूक़ हुआ कुछ।
     सुख-सुकून को क़ायम रखने-
     किसी शक्ति ने जन्म लिया।।

Saturday, July 13, 2019

डर है...



डर है,सदानीरा गंगा कहीं कदा नीरा-न बन जाये।
मसलन,धरती पर कभी सतत बाहिनी-पाप नाशिनी-
लोक तारिणी-पवित्र सलिला बहती थी कोई गंगा,
जिसमें पर्वों-उत्सवों पर लोग डुबकी लगा कर -
तर्पण कर समझ लेते थे स्वयम को पाप-मुक्त।
     डर है,हरी-भरी वनस्पतियों-पेड़-पौधों से आच्छादित,
     जंगल के पूर्णरूपेण अमंगल का ,
     अर्थात,थी कभी शोभायमान वसुन्धरा पेड़-पौधों से,
     तनें जिनके सख़्त, पर भीतर गीली लकड़ी की,
      कोमल मांसलता से युक्त -
      शाखों पे जिनकी विराजमान रहते थे हरे पत्ते,
       रंग-बिरंगे पुष्प एवम फल-कुछ खट्टे,कुछ मीठे।
डर है-हरे-भरे जंगल की जगह
कठोर-निष्प्राण -निश्चेत कंक्रीट के जंगल की -
जो जंगल तो है-बृक्षों वाला -शाखों वाला-
फूल-पत्तों व फल वाला।
    मगर, वृक्षों के तने हैं-ईंट-पत्थर-सीमेंट के,
    बड़े ही कठोर,शाखाएं-बेड-रूम,ड्राइंग-रूम,
   गेस्ट-रूम,वाश-रूम आदि-आदि।
   ऐसे जंगल मे पंछियों की कलरव की जगह,
   सुनायी देता है-आपसी खींच-तान, मज़हबी
   मन-मुटाव,लड़ाई-झगड़े,अत्याचार-हत्या  व
   लूट-पाट का बेसुरा रव।
डर है,मिल्स-फैक्ट्रीज-आधुनिक औद्योगीकरण
की चपेट में इसके आने का-
डर है-वायु-प्रदूषण के उस भयावह स्वरूप का-
जब जीव तो जन्म लेगा-
पर,हो जाएगा महरूम भरपूर बचपन से-
किशोरावस्था-युवावस्था-बुढापा की बात तो दूर।
    बची-खुची मनुजता करेगी शोषण एक-दूजे का,
   बुझायेगी प्यास एक-दूसरे के रक्त से,
   मिटाएगी भूख एक-दूसरे की मज्जा-मांस से,
    हो जायेगा मुक़म्मल अभाव,
    जल-वायु-अन्न-फूल-फल का-
     विनाश-सर्वनाश!!

पत्थर लुढ़क-लुढ़क के...



पत्थर लुढ़क-लुढ़क के भगवान बनता है,
शैतान खा के ठोकर,इन्सान बनता है।
करके मदद यतीमों की निःस्वार्थ भाव से-
इन्सान अपने मुल्क़ की पहचान बनता है।।
    होती हिना है सुर्ख़,पत्थर-प्रहार से,
    धीरज न खोवे सैनिक,सीमा की हार से।
    अपने वतन की माटी पर,प्राण कर निछावर-
    बलिदान की मिसाल वो, जवान बनता है।।
माता समान माटी, माटी समान माता,
परम पुनीत ऐसा संयोग रच विधाता।
जीवन में हर किसी को,मोकाम यह दिया है-
कर के नमन जिन्हें वो,महान बनता है।।
    लेना अगर सबाब, तुमको ख़ुदा का है,
    कर दो उजाला मार्ग जो,तम की घटा का है।
    भटके पथिक को रौशनी,दिखाते रहो सदा-
    करने वाला ऐसा जाहिर जहान बनता है।।
वादा किसी को करके,मुकरना न चाहिए,
पद उच्च कोई पा के,बदलना न चाहिए।
धन-शक्ति के घमण्ड में,औक़ात जो भूला-
इन्सान वो समझ लो,हैवान बनता है।।    
महिमा कभी भी सिंधु की,घटते नहीं देखा,
    घमण्ड को समर्थ में,बढ़ते नहीं देखा।
   देखा नहीं सज्जन को कभी,कड़ुवे वचन कहते-
   नायाब इस ख़याल से ही,ईमान बनता है।।
जल पे लक़ीर खींचना, सम्भव नहीं यारों,
पश्चिम उगे ये भास्कर,सम्भव नहीं यारों।
आना अगर है रात को तो आ के रहेगी-
निश्चित प्रभात होने का,विधान बनता है।।
    ऐसे ही ज़िन्दगी की गाड़ी को हाँकना,
    चलते रहो बराबर,पीछे न झाँकना।
    दीये की लौ समक्ष,तूफ़ान भी झुकता-
    तूफ़ान भी दीये का,क़द्रदान बनता है।।

कोई किसी का दुनिया में...



कोई किसी का दुनिया में होता नहीं सगा,
अन्तिम घड़ी में रिश्ते,देते हैं सब दगा।
मां-बाप-भाई-भगिनी,होते हैं चार दिन के-
पिंजरे में क़ैद पंछी,हो जाता झट दफ़ा।।
      कलियाँ चमन में खिल के,कुछ पल में बिखरतीं,
      रवि-रश्मियाँ प्रखर भी,हर शाम को ढलतीं।
      हो जातीं दफ़्न सांसें, झट-पट बिना रुके-
      रक्खा जिन्हें था सबने,सीने से यूँ लगा।।
सम्बन्ध अग्नि-जल का,शाश्वत-यथार्थ है,
आकाश औ पवन का,अविरल-अबाध है।
सरिता का जल है मिलता,सागर से जा गले-
निःस्वार्थ प्रेम-रस में,सम्बन्ध यह पगा।।
      बर्फीली चोटियों पे,चन्दा की जो चमक,
      फूलों पे भनभनाते,भौरों की जो भनक।।
      कल थी औ आज है,रहेगी यह सदा-
     कोई नहीं सकेगा,इसको कभी भगा।।
ब्रह्म से अक्षर औ अक्षर से ब्रह्म है
सम्बन्ध यह चिरातन, इसमें न छद्म है।
ब्रह्म को तो केवल,साक्षर ही समझता-
कोई सके ना ब्रह्म के,अस्तित्व को डिगा।।
     सृष्टि के पहले औ न बाद सृष्टि के, 
     न था,न कुछ रहेगा,सिवाय वृष्टि के।
     बस ब्रह्म ही है शाश्वत औ ब्रह्म रहेगा-
     अभिद-अमिट-अक्षत-असुप्त औ जगा।।