Saturday, July 13, 2019

डर है...



डर है,सदानीरा गंगा कहीं कदा नीरा-न बन जाये।
मसलन,धरती पर कभी सतत बाहिनी-पाप नाशिनी-
लोक तारिणी-पवित्र सलिला बहती थी कोई गंगा,
जिसमें पर्वों-उत्सवों पर लोग डुबकी लगा कर -
तर्पण कर समझ लेते थे स्वयम को पाप-मुक्त।
     डर है,हरी-भरी वनस्पतियों-पेड़-पौधों से आच्छादित,
     जंगल के पूर्णरूपेण अमंगल का ,
     अर्थात,थी कभी शोभायमान वसुन्धरा पेड़-पौधों से,
     तनें जिनके सख़्त, पर भीतर गीली लकड़ी की,
      कोमल मांसलता से युक्त -
      शाखों पे जिनकी विराजमान रहते थे हरे पत्ते,
       रंग-बिरंगे पुष्प एवम फल-कुछ खट्टे,कुछ मीठे।
डर है-हरे-भरे जंगल की जगह
कठोर-निष्प्राण -निश्चेत कंक्रीट के जंगल की -
जो जंगल तो है-बृक्षों वाला -शाखों वाला-
फूल-पत्तों व फल वाला।
    मगर, वृक्षों के तने हैं-ईंट-पत्थर-सीमेंट के,
    बड़े ही कठोर,शाखाएं-बेड-रूम,ड्राइंग-रूम,
   गेस्ट-रूम,वाश-रूम आदि-आदि।
   ऐसे जंगल मे पंछियों की कलरव की जगह,
   सुनायी देता है-आपसी खींच-तान, मज़हबी
   मन-मुटाव,लड़ाई-झगड़े,अत्याचार-हत्या  व
   लूट-पाट का बेसुरा रव।
डर है,मिल्स-फैक्ट्रीज-आधुनिक औद्योगीकरण
की चपेट में इसके आने का-
डर है-वायु-प्रदूषण के उस भयावह स्वरूप का-
जब जीव तो जन्म लेगा-
पर,हो जाएगा महरूम भरपूर बचपन से-
किशोरावस्था-युवावस्था-बुढापा की बात तो दूर।
    बची-खुची मनुजता करेगी शोषण एक-दूजे का,
   बुझायेगी प्यास एक-दूसरे के रक्त से,
   मिटाएगी भूख एक-दूसरे की मज्जा-मांस से,
    हो जायेगा मुक़म्मल अभाव,
    जल-वायु-अन्न-फूल-फल का-
     विनाश-सर्वनाश!!

पत्थर लुढ़क-लुढ़क के...



पत्थर लुढ़क-लुढ़क के भगवान बनता है,
शैतान खा के ठोकर,इन्सान बनता है।
करके मदद यतीमों की निःस्वार्थ भाव से-
इन्सान अपने मुल्क़ की पहचान बनता है।।
    होती हिना है सुर्ख़,पत्थर-प्रहार से,
    धीरज न खोवे सैनिक,सीमा की हार से।
    अपने वतन की माटी पर,प्राण कर निछावर-
    बलिदान की मिसाल वो, जवान बनता है।।
माता समान माटी, माटी समान माता,
परम पुनीत ऐसा संयोग रच विधाता।
जीवन में हर किसी को,मोकाम यह दिया है-
कर के नमन जिन्हें वो,महान बनता है।।
    लेना अगर सबाब, तुमको ख़ुदा का है,
    कर दो उजाला मार्ग जो,तम की घटा का है।
    भटके पथिक को रौशनी,दिखाते रहो सदा-
    करने वाला ऐसा जाहिर जहान बनता है।।
वादा किसी को करके,मुकरना न चाहिए,
पद उच्च कोई पा के,बदलना न चाहिए।
धन-शक्ति के घमण्ड में,औक़ात जो भूला-
इन्सान वो समझ लो,हैवान बनता है।।    
महिमा कभी भी सिंधु की,घटते नहीं देखा,
    घमण्ड को समर्थ में,बढ़ते नहीं देखा।
   देखा नहीं सज्जन को कभी,कड़ुवे वचन कहते-
   नायाब इस ख़याल से ही,ईमान बनता है।।
जल पे लक़ीर खींचना, सम्भव नहीं यारों,
पश्चिम उगे ये भास्कर,सम्भव नहीं यारों।
आना अगर है रात को तो आ के रहेगी-
निश्चित प्रभात होने का,विधान बनता है।।
    ऐसे ही ज़िन्दगी की गाड़ी को हाँकना,
    चलते रहो बराबर,पीछे न झाँकना।
    दीये की लौ समक्ष,तूफ़ान भी झुकता-
    तूफ़ान भी दीये का,क़द्रदान बनता है।।

कोई किसी का दुनिया में...



कोई किसी का दुनिया में होता नहीं सगा,
अन्तिम घड़ी में रिश्ते,देते हैं सब दगा।
मां-बाप-भाई-भगिनी,होते हैं चार दिन के-
पिंजरे में क़ैद पंछी,हो जाता झट दफ़ा।।
      कलियाँ चमन में खिल के,कुछ पल में बिखरतीं,
      रवि-रश्मियाँ प्रखर भी,हर शाम को ढलतीं।
      हो जातीं दफ़्न सांसें, झट-पट बिना रुके-
      रक्खा जिन्हें था सबने,सीने से यूँ लगा।।
सम्बन्ध अग्नि-जल का,शाश्वत-यथार्थ है,
आकाश औ पवन का,अविरल-अबाध है।
सरिता का जल है मिलता,सागर से जा गले-
निःस्वार्थ प्रेम-रस में,सम्बन्ध यह पगा।।
      बर्फीली चोटियों पे,चन्दा की जो चमक,
      फूलों पे भनभनाते,भौरों की जो भनक।।
      कल थी औ आज है,रहेगी यह सदा-
     कोई नहीं सकेगा,इसको कभी भगा।।
ब्रह्म से अक्षर औ अक्षर से ब्रह्म है
सम्बन्ध यह चिरातन, इसमें न छद्म है।
ब्रह्म को तो केवल,साक्षर ही समझता-
कोई सके ना ब्रह्म के,अस्तित्व को डिगा।।
     सृष्टि के पहले औ न बाद सृष्टि के, 
     न था,न कुछ रहेगा,सिवाय वृष्टि के।
     बस ब्रह्म ही है शाश्वत औ ब्रह्म रहेगा-
     अभिद-अमिट-अक्षत-असुप्त औ जगा।।

राष्ट्र्वाद की भ्रष्टवाद पर...



राष्ट्र्वाद की भ्रष्टवाद पर अद्भुत विजय हुयी है,
विजय जादुई देख कर दुनिया चकित हुयी है।
लोकतंत्र का नवल जागरण लिया पुनः अंगड़ाई-
वंशवाद औ जातिवाद की घृणित नीति अब छोड़ो।।
   सब जन मिलकर एकसाथ नव संस्कृति-दीप जलाओ,
   स्वार्थ निशा का फैला जन में तम-अंधियार मिटाओ।
   जन-कल्याण से बढ़कर कोई दूजा धर्म नहीं है-
   सड़े-गले-निष्प्राण मज़हबी बन्धन को अब तोड़ो।।
विगत यामिनी नव प्रभात तैयार तुम्हारे स्वागत में,
नयी चेतना का लेकर उपहार तुम्हारे स्वागत में।
नव विकास का नवल गीत अब मुखरित हो सब गाओ-
मानवता की स्वतंत्र डोर में बंधकर रिश्ता  जोड़ो।।
   सदा रही इस देश की धरती अति पावन उपकारी,
   जो भी आया दिया शरण इसने बनकर हितकारी।
   तजकर अब संकीर्ण भाव को जनहित में लग जाओ-
   वक़्त आ गया वर्ग-भेद के चिंतन से मुख मोड़ो।।
शिक्षालय-रुग्णालय सुधरें,सुधरें सभी जलाशय,
प्रकृति-कोष,पशु-पक्षी के प्रति स्वस्थ हो सबका आशय।
वृक्ष-वनस्पति,सरिता-सागर से सम्बन्ध पुराना-
पर्यावरण जो दूषित करते उनका भण्डा फोड़ो।।
   भाषा-विवाद संकेत अशुभ बहु होता है
  ज्ञान विविध भाषा का रखना सुखकर शुभ होता है।
  मानव-चिंतन,बोली-भाषा,मत बांधो सीमा  में-
  चिंतन जो संकीर्ण हैं रखते,उनकी दिशा मरोड़ो।।
वंशवाद औ जातिवाद की घृणित नीति अब छोड़ो।।

आज दिवस सम्बन्धों...



आज दिवस सम्बन्धों का मनाना पड़ता है।
जनक-जानकी-रिश्ते को जताना पड़ता है।।
  पिता गगन गम्भीर और माता है पृथ्वी जैसी,
  इस विचार की आज तो जानो हो गयी ऐसी-तैसी।
  भाई-बहन हैं दीपक-बाती को बताना पड़ता है।।
                          आज दिवस सम्बन्धों.....।।
पिता-पुत्र-सम्बन्ध मित्रवत,सोलह का जब बेटा,
ऐसा लिखा विचार शास्त्र में,कहते शास्त्र-प्रणेता।
अपनी इसी पुरानी थाती को -बचाना पड़ता है।।
                          आज दिवस सम्बन्धों.....।।
परत धूल की जमी हुयी है,मानो अब सम्बन्धों पर,
पड़ती नहीं दृष्टि अब जानो,कुल के सब अनुबन्धों पर।
कर के पुनि सम्बन्ध-स्मरण माटी को-हटाना पड़ता है।।
                          आज दिवस सम्बन्धों......।।
पूरब के प्राचीन मूल्य पर, दखल हो गया पश्चिम का,
भौतिकवादी आपा-धापी,स्वार्थ भंगिमा बंकिम का।
कुप्रभाव से बिछड़े जीवन-साथी को-मिलाना पड़ता है।।
                          आज दिवस सम्बन्धों........।।
ऐसी प्रथा पश्चिमी मित्रों,शोभा बनी वतन की,।
दिवस एक पर स्मृति रखना,प्रथा हुयी शुभ चिंतन की।
अग्नि-कुण्ड में कुत्सित परिपाटी को-जलाना पड़ता है।।
                          आज दिवस सम्बन्धों.........।।
संस्कृति-मूल्य स्वतन्त्र देश के,होते एक धरोहर हैं,
यही बनाते किसी मुल्क़ को,अनुपम और मनोहर हैं।
दिवस एक ले शपथ सभी बरबादी को-भगाना पड़ता है।।
                          आज दिवस सम्बन्धों........।।
वतन-स्वतन्त्रता-दिवस मनाना,सबसे उत्तम यारों,
पंख पसारे खुले गगन में,उड़ि खग सक्षम यारों।
जन-जन में बस सुप्त बोध आज़ादी को-जगाना पड़ता है।।
          आज दिवस सम्बन्धों का मनाना पड़ता है।।